देहरादून: इस साल केदारनाथ धाम में भक्तों का भारी सैलाब उमड़ रहा है। रिकॉर्ड तोड़ भीड़, ट्रैफिक जाम और अव्यवस्थाओं की तस्वीरें हर रोज़ सामने आ रही हैं। लेकिन कैमरे की नज़रों से दूर, बाबा केदारनाथ के धाम में एक ऐसा विवाद सुलग रहा है, जिसने करोड़ों शिवभक्तों को हैरान कर दिया है। यह जंग केदारनाथ के सबसे बड़े और पवित्र पद… ‘रावल’ की गद्दी पर वर्चस्व को लेकर है। एक तरफ सदियों पुरानी परंपराओं का हवाला देते वर्तमान रावल हैं, तो दूसरी तरफ कानून की किताब थामे बद्री-केदार मंदिर समिति (BKTC)। विवाद सिर्फ गद्दी का नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत से आने वाले करोड़ों रुपये के दान में वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप भी लग चुके हैं। आइए समझते हैं कि केदारनाथ में रावल का पद अचानक इतने विवादों, आरोपों और अनशन की चेतावनियों तक कैसे पहुंच गया।
विवाद की जड़: उत्तराधिकारी की एकतरफा घोषणा
इस कहानी की शुरुआत इसी साल फरवरी में हुई। केदारनाथ के वर्तमान और 324वें रावल, भीमाशंकर लिंग (जो साल 2000 से इस सर्वोच्च पद पर विराजमान हैं), ने अपनी बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए गद्दी छोड़ने की इच्छा जताई। यहाँ तक सब ठीक था। लेकिन विवाद तब शुरू हुआ जब महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक निजी कार्यक्रम के दौरान, रावल ने मंदिर समिति को भरोसे में लिए बिना, अपने शिष्य केदार लिंग को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर उनका पट्टाभिषेक कर दिया।
बद्री-केदार मंदिर समिति ने इसे सीधे तौर पर खारिज कर दिया। समिति का तर्क साफ था कि नए रावल की नियुक्ति कोई निजी फैसला नहीं हो सकता। श्री बद्रीनाथ-श्री केदारनाथ मंदिर अधिनियम, 1939 के तहत एक स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया है। इसके लिए बाकायदा एक स्क्रीनिंग कमेटी बनती है, जो उम्मीदवार की योग्यता, शिक्षा और पृष्ठभूमि की गहन जाँच करती है, जिसके बाद ही रावल के नाम पर अंतिम मुहर लगती है।
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प्रशासनिक आदेश और अनशन की चेतावनी
मई में हुए एक प्रशासनिक आदेश ने इस आग में घी डालने का काम किया। मंदिर समिति के सीईओ ने गुप्तकाशी विश्वनाथ मंदिर से पुजारी शांत लिंग (जिन्हें रावल ने उत्तराधिकारी घोषित किया था) का तबादला उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर कर दिया और उनकी जगह ईश्वर लिंग को नियुक्त कर दिया। वर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग ने इसे अपनी शक्तियों और अधिकारों पर सीधा हमला माना। उन्होंने चेतावनी दे डाली कि अगर यह नियुक्ति रद्द नहीं हुई, तो वे अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ जाएंगे। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रावल ने सीधे प्रधानमंत्री तक को पत्र लिख दिया है।
शिष्यों की बगावत और करोड़ों के चंदे पर सवाल
इस पूरे विवाद में रावल के ही शिष्य, पंडिताराध्य शिवाचार्य और शांतवीर शिवाचार्य हिरेमठ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रावल नियुक्ति को गलत बता दिया है। उन्होंने मौजूदा रावल पर गंभीर वित्तीय आरोप लगाते हुए कहा है कि दक्षिण भारत से मंदिर के नाम पर एकत्र किया गया भारी-भरकम दान बीकेटीसी के खाते में जमा ही नहीं किया गया है। अब इस मामले में भी जांच की मांग उठने लगी है। 1939 में ब्रिटिश काल में जब मंदिर अधिनियम बना, तो व्यवस्थाएं बदलने लगीं। इस कानून ने रावल के एकाधिकार को सीमित कर दिया और मंदिर समिति को प्रशासनिक मुखिया बना दिया। आज स्थिति यह है कि रावल मंदिर के धार्मिक अनुष्ठानों के सर्वोच्च अधिकारी तो हैं, लेकिन प्रशासनिक और वित्तीय फैसले मंदिर समिति के अधीन आते हैं। वर्तमान रावल का तर्क है कि वे उसी सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का पालन कर रहे हैं, जबकि समिति 1939 के एक्ट का डंडा चला रही है।
कौन होते हैं ‘रावल’ और क्या है लिंगायत परंपरा?
रावल हमेशा वीरशैव लिंगायत समुदाय से चुने जाते हैं। यह मुख्य रूप से कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना का एक प्रमुख शैव संप्रदाय है। 12वीं शताब्दी में दार्शनिक और समाज सुधारक बसवन्ना ने इसे व्यापक स्वरूप दिया था और जाति-प्रथा का कड़ा विरोध किया था। शिव को ही सर्वोच्च सत्ता मानने वाले इस समुदाय के लोग हमेशा अपने शरीर पर एक छोटा शिवलिंग धारण करते हैं। इसी समुदाय में संन्यासियों या पुजारियों का एक वर्ग होता है, जिसे ‘जंगम’ (चलता-फिरता शिवलिंग) कहा जाता है। केदारनाथ के रावल और पंच केदार के अन्य मंदिरों के पुजारी हमेशा इसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। रावल बनने के लिए केवल लिंगायत होना ही काफी नहीं है। रावल को पूर्ण रूप से संन्यासी और आजीवन अविवाहित होना अनिवार्य है। साथ ही, उनका वेदों, उपनिषदों और शिव पूजा के प्राचीन विधान व तंत्र का प्रकांड विद्वान होना भी जरूरी है।

