Saturday, June 6, 2026
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इंसानों की बलि का जश्न: गढ़वाल की जानलेवा ‘बेड़ा’ प्रथा

दीपक पुरोहित: देहरादून। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के इतिहास में आज से महज दो सदी पहले तक इंसानों की बलि दिए जाने की एक खौफनाक प्रथा का पालन किया जाता था। इस जानलेवा प्रथा को एक उत्सव की तरह आयोजित किया जाता था, जिसे ‘भुंडा’ या ‘बेड़ा’ कहा जाता था। Phyoli.com की इस विशेष रिपोर्ट में आज इस रूह कंपा देने वाले इतिहास के पन्नों को पलटा जा रहा है।

विशेषकर गढ़वाल के टिहरी रियासत वाले हिस्से में इस खौफनाक प्रथा के कई प्रामाणिक साक्ष्य देखे गए हैं। 19वीं सदी की शुरुआत में इस क्षेत्र की यात्रा करने वाले तीन ब्रिटिश लेखकों एफ.वी. रैपर, विलियम मूरक्राफ्ट और “माउंटेनियर” (डब्ल्यू. विल्सन) द्वारा इस प्रथा का आँखों देखा विवरण दर्ज किया गया है, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। जिसमें अच्छी फसल के लिए देवता को खुश करने के लिए दलित समाज के लोग एक बेहद जानलेवा रस्म के आयोजन का हिस्सा बनते। इसमें कई बार मुख्य नायक की मौत तक हो जाती।

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मौत की रस्सी और देवताओं का आशीर्वाद

कैप्टन एफ.वी. रैपर द्वारा साल 1808 में श्रीनगर प्रवास के दौरान इस अनुष्ठान को बेहद करीब से देखा गया था। बाद में उनके द्वारा अपनी पुस्तक “नैरेटिव ऑफ ए सर्वे फॉर द परपज़ ऑफ डिस्कवरिंग द सोर्सेज ऑफ द गंगा” में इसका खौफनाक वर्णन किया गया। यह बताया गया कि यह बलिदान देवताओं को प्रसन्न करने के लिए दिया जाता था। ऐसी मान्यता थी कि इस अनुष्ठान को संपन्न किए जाने से फसलों को चूहों और कीड़े-मकोड़ों के प्रकोप से बचाया जा सकेगा।

इस रस्म के तहत एक बेहद लंबी और मोटी रस्सी को पहाड़ की चोटी से लेकर नीचे नदी किनारे एक खूंटे तक बांधा जाता था। इसके बाद ‘नट जाति’ के एक व्यक्ति को उस रस्सी के ऊपरी सिरे पर बैठाकर नीचे की ओर धकेल दिया जाता था। संतुलन बनाए रखने के लिए उस व्यक्ति की जाँघों पर केवल रेत के बड़े-बड़े थैले बांधे जाते थे।

यदि वह व्यक्ति सुरक्षित नीचे पहुँच जाता, तो इसे एक शुभ संकेत माना जाता था और जमींदारों द्वारा उसे उदारतापूर्वक पुरस्कृत किया जाता था। लेकिन, यदि संतुलन बिगड़ता और वह व्यक्ति नीचे गिर जाता, तो उसकी मृत्यु निश्चित मानी जाती थी। रैपर के खौफनाक विवरण के अनुसार, घायल बच जाने की स्थिति में भी उस व्यक्ति का सिर धड़ से अलग कर रुष्ट देवता को अर्पित कर दिया जाता था। आमतौर पर खराब फसल के बाद ही इस अंधविश्वासी प्रथा का आयोजन किया जाता था।

फरवरी 1820 में श्रीनगर से गुजरते हुए ब्रिटिश अन्वेषक विलियम मूरक्राफ्ट द्वारा भी ‘बरात’ नामक इस अनुष्ठान का उल्लेख किया गया है। उनके द्वारा बताया गया कि अनुष्ठान के लिए घास से बनी लगभग तीन इंच मोटी और बारह सौ हाथ लंबी रस्सी का इस्तेमाल किया जाता था।

अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति को एक खोखली लकड़ी की काठी पर बिठाया जाता था और पैरों पर बँधे भारी पत्थरों की मदद से उसे रस्सी पर तेजी से फिसलाया जाता था। जमीन पर पहुँचते-पहुँचते वह व्यक्ति लगभग अचेत हो जाता था। मूरक्राफ्ट को एक 60 वर्षीय व्यक्ति ‘बंचू’ से मिलवाया गया, जिसके द्वारा यह दुस्साहसिक कार्य 16 बार सफलतापूर्वक किया जा चुका था।

“ए समर रैम्बल इन द हिमालया” पुस्तक में लेखक माउंटेनियर द्वारा भी इस रस्म का भयानक मंजर बयां किया गया है। उनके द्वारा लिखा गया कि इस उत्सव में स्त्री-पुरुषों की भारी भीड़ जमा होती थी और अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति को वाद्य यंत्रों व परिजनों के विलाप के बीच पहाड़ की चोटी तक ले जाया जाता था। वह लिखते हैं कि “जब उस व्यक्ति को रस्सी पर छोड़ा जाता था, तो वह भयानक वेग से कई सौ गज नीचे आता था और उसके पीछे धुएँ की एक लकीर खिंचती चली जाती थी।

उनके द्वारा यह भी बताया गया कि ये लोग एक विशेष जाति के होते थे और यही उनका पेशा माना जाता था। यह लोग दलितों की नट या भेड़ा समाज के लोग होते थे। व्यक्ति के डर कर भाग जाने की आशंका के चलते उसे आयोजन से कुछ दिन पहले से ही कड़ी निगरानी रखी जाता था। रस्सी टूटने की स्थिति में मौत को लगभग तय माना जाता था।

इतिहास के पन्नों में दर्ज जातिगत अन्याय

इन अंग्रेज अधिकारियों की रिपोर्टों के माध्यम से आज यह साफ तौर पर जाना जा सकता है कि अतीत में उत्तराखंड के दलित समुदायों के साथ किस तरह के अन्याय को संस्थागत रूप दिया गया था। देवताओं को प्रसन्न करने का सबसे बड़ा जोखिम एक खास वर्ग (नट या अन्य पिछड़ी जातियों) द्वारा ही उठाया जाता था। देवताओं के रुष्ट होने पर जान भी उसी वर्ग से ली जाती थी, जबकि सवर्ण समाज के लोग केवल पुण्य और दान का हिसाब रखा करते थे। पर आज भी श्रीनगर और खिर्सू के आसपास के इलाकों में इस प्रथा का आयोजन होता है जिसमें इंसानों के बजाए पुतलों का इस्तेमाल किया जाता है।

आज के दौर में भले ही इस रस्म में इंसान की जगह केवल पुतले का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि भले ही यह जानलेवा प्रथा आज समाप्त कर दी गई हो, पर क्या हजारों साल पुरानी इस जाति व्यवस्था के अंश आज भी हमारी मानसिकता में कहीं गहराई तक मौजूद नहीं हैं? इस विषय पर Thirdpole.live पर एक वीडियो भी उपलब्ध है।

नोट: लेख ए समर रैम्बल इन द हिमालया पुस्तक के साथ ऐतिहासिक दस्तावेजों और यात्रा वृत्तांतों पर आधारित है। इस खौफनाक प्रथा के बारे में आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें और ऐसी ही ऐतिहासिक कहानियों के लिए पढ़ते रहें Phyoli.com।

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