देहरादून, दीपक पुरोहित: प्रकृति के साथ इंसान के खिलवाड़ का इससे बड़ा और दर्दनाक विरोधाभास क्या हो सकता है? हिमालय की वो गोद, जो हर साल सर्दियों में कुदरती तौर पर 4 से 5 फीट मोटी बर्फ की चादर ओढ़ती थी, आज वहां के लोग सरकार से ‘कृत्रिम बर्फ’ (Artificial Snow) बनाने की गुहार लगा रहे हैं। उत्तराखंड का औली, जो दुनिया भर में अपनी मखमली और प्राकृतिक ढलानों के लिए मशहूर है, आज एक अजीबोगरीब आंदोलन का गवाह बन रहा है।
समुद्र तल से 3,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित औली में जहां इस वक्त स्कीइंग का रोमांच होना चाहिए था, वहां सन्नाटा है और धूल उड़ रही है। स्कीइंग स्लोप्स बंजर पड़े हैं और स्थानीय लोग, जिनकी रोजी-रोटी बर्फ पर टिकी है, हताशा में नेताओं के पुतले फूंक रहे हैं। उनकी मांग एक ही है— “अगर आसमान से बर्फ नहीं गिर रही, तो मशीनें लगाकर बर्फ बनाइए, ताकि हमारे पेट की आग बुझ सके। लोग यहां पर्यटन के नाम पर हुए भ्रष्टाचार की जांच की भी मांग कर रहे हैं।
यह प्रदर्शन केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक भयानक चेतावनी है। पिछले तीन सालों से औली में बर्फबारी नाममात्र की हो रही है, लेकिन इस बार हिमालय पिछले 40 सालों के सबसे बड़े ‘स्नो-ड्रॉट’ (Snow Drought) का सामना कर रहा है। विडंबना देखिए, जिस औली में स्कीइंग का पूरा इकोसिस्टम ‘नेचुरल स्नो’ पर आधारित था, वहां अब कृत्रिमता की मांग मजबूरी बन गई है। 15 हजार से ज्यादा परिवारों का रोजगार, होटल व्यवसाय और पर्यटन सब ठप पड़ा है।
औली में कृत्रिम बर्फ की मांग करना, घाव पर बैंड-एड लगाने जैसा है। यह फौरी तौर पर पर्यटकों को तो वापस ला सकता है, लेकिन क्या यह गंगा और यमुना जैसी नदियों को पानी दे पाएगा? क्या यह सेब के बागानों को बचा पाएगा?
औली में जलते पुतले सिर्फ सरकार के खिलाफ गुस्सा नहीं हैं, बल्कि यह उस डर का प्रदर्शन है जो बताता है कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ अब किताबों से निकलकर हमारे दरवाज़े पर खड़ी है। जब पहाड़ का आदमी पहाड़ जैसी बर्फ के लिए मशीन मांग ले, तो समझ लीजिए कि कुदरत का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है।
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