हिमालय में 8,300 साल पहले भी होती थी धान की खेती
दीपक पुरोहित, देहरादून:
8300 साल पहले जब दुनिया की कई सभ्यताएं ठीक से आकार भी नहीं ले पाई थीं, तब मध्य हिमालय की जमा देने वाली ठंड में इंसान सिर्फ शिकार नहीं कर रहा था, बल्कि बाकायदा आग जलाकर धान और चौलाई पका रहा था। आईआईटी रुड़की की चमोली स्थित टोली झील में हुई प्राचीन डीएनए रिसर्च ने उत्तराखंड व मध्य हिमालय के इतिहास की टाइमलाइन को ही नहीं पलटा है, बल्कि आदिमानव की ‘थाली’ के चौंकाने वाले राज भी खोल दिए हैं। झील की तलछट में मिले सुबूत बताते हैं कि हजारों साल पहले भी यहां के लोग मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल और उन्नत खान-पान जानते थे।
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आईआईटी रुड़की के अर्थ साइंस विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर प्रदीप श्रीवास्तव के अनुसार अब तक उत्तराखंड में मानव उपस्थिति के सबसे पुराने प्रमाण लगभग 4,000 से 4,500 वर्ष पुराने माने जाते थे। इनमें अल्मोड़ा के शैलचित्र, मलारी और रूपकुंड से मिले मानव अवशेष तथा बाद के पुरातात्विक प्रमाण शामिल थे। लेकिन टोली झील से मिले जैविक साक्ष्यों ने इस पूरी समयरेखा को बदलने के संकेत दिए हैं। शोध में केवल मानव उपस्थिति ही नहीं मिली। तलछट में धान, चौलाई और अन्य वनस्पतियों के जैविक संकेत भी मिले हैं। साथ ही आग जलाने से बनने वाले रासायनिक अवशेष, मिट्टी के बर्तनों के प्रमाण और बाद की परतों में धातु उपयोग के संकेत भी सामने आए हैं। इस शोध को पूरा करने वाली टीम में पोस्ट डॉक्टरेट फेलो विशाखा बिष्ट, एकता सिंह व रिसर्च फ्लो सुस्मिता सिंह शामिल रही।
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झील की मिट्टी ने कैसे खोले राज
वैज्ञानिकों ने चमोली के गोपेश्वर क्षेत्र स्थित टोली झील की कई मीटर गहराई से तलछट के नमूने एकत्र किए। इन नमूनों का अध्ययन सेडिमेंटरी एंशिएंट डीएनए और शॉटगन मेटाजेनोमिक्स जैसी अत्याधुनिक तकनीकों से किया गया। सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना था कि मिला हुआ डीएनए आधुनिक प्रदूषण नहीं, बल्कि वास्तव में हजारों वर्ष पुराना है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नियंत्रित सैंपलिंग, डीएनए डैमेज पैटर्न, फ्रैगमेंट विश्लेषण और बायोइन्फॉर्मेटिक्स तकनीकों का उपयोग किया। जांच में पुष्टि हुई कि यह वास्तव में लगभग 8,300 वर्ष पुराना मानव डीएनए है।
हिमालय के मानव इतिहास में नए पन्ने जुड़ेंगे
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हिमालय में मानव प्रवास, बसावट और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों को समझने में भी नई दिशा मिलेगी। वैज्ञानिक का कहना है कि यदि हिमालय की अन्य झीलों और घाटियों में भी इसी तकनीक से अध्ययन किया गया तो मानव उपस्थिति के इससे भी पुराने प्रमाण मिल सकते हैं।

